सहकर्मियों के उत्पीड़न से परेशान सब इंस्पेक्टर ने खाया जहर, अस्पताल में इलाज के दौरान मौत

तेलंगाना के भद्राद्री कोठागुडेम जिले में कार्यरत एक सब इंस्पेक्टर ने अपने सहकर्मियों द्वारा उत्पीड़न के कारण खुदकुशी कर ली. उसने पिछले सप्ताह जहरीला पदार्थ खा लिया, जिसके बाद उसे इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती कराया था.रविवार तड़के अस्पताल में उसकी मौत हो गई. मृतक एसआई की पत्नी की शिकायत के आधार पर चार कांस्टेबलों और सीआई के खिलाफ केस दर्ज करके जांच की जा रही है.एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि एसआई श्रीरामुलु श्रीनू अनुसूचित जाति से ताल्लुक रखते थे. वो वारंगल जिले के नरकापेटा गांव के रहने वाले थे. अश्वरावपेट पुलिस स्टेशन में तैनात थे. 30 जून को उन्होंने महबूबाबाद जिले में जहरीला पदार्थ पीकर आत्महत्या करने का प्रयास किया था. इसके बाद उनको हैदराबाद के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां आज रविवार को इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.रविवार को सोशल मीडिया पर एक वीडियो भी वायरल हुआ, जिसमें एसआई ने अश्वरावपेट पुलिस स्टेशन के चार कांस्टेबलों और एक सर्किल इंस्पेक्टर (सीआई) पर उत्पीड़न का आरोप लगाया था. यह वीडियो उस समय बनाया गया, जब एसआई का अस्पताल में इलाज चल रहा था. वीडियो में उन्होंने कहा है कि कांस्टेबलों ने उनके रिकॉर्ड लिखने के काम में बाधा डाली और सहयोग नहीं किया. उन्हें परेशान करते रहे.सकी शिकायत उन्होंने सर्किल इंस्पेक्टर (सीआई) से की थी, लेकिन उन्होंने इस मामले को नजरअंदाज कर दिया. एसआई ने आगे आरोप लगाया कि जांच करने की बजाए सीआई ने उल्टे उन्हें ही नोटिस भेज दिया और जानबूझकर परेशान किया. उन्होंने इस संबंध में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से भी शिकायत की है, लेकिन किसी ने कोई एक्शन नहीं लिया. यही वजह है कि उन्हें खुदकुशी करने जैसा कदम उठाना पड़ा.इस बीच वारंगल जिले में कुछ संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया. एसआई के लिए न्याय की मांग करते हुए नारे लगाए और आरोपियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है. एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि एसआई की पत्नी की शिकायत के आधार पर महबूबाबाद में सीआई और चार कांस्टेबलों के खिलाफ अनुसूचित जाति और जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया है.बताते चलें कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम 1989, 11 सितंबर, 1989 को पारित हुआ था. इसे 30 जनवरी 1990 से जम्मू-कश्मीर छोड़ सारे भारत में लागू किया गया था. यह अधिनियम उस प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होता हैं, जो अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं हैं. वह व्यक्ति इस वर्ग के सदस्यों का उत्पीड़न करता है. इस अधिनियम मे 5 अध्याय और 23 धाराएं हैं.

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