धक्के से रूसी सेना में किया शामिल, यूक्रेन से मौत के मुंह से बचकर घर लौटे, बताई आपबीती

र्क परमिट पर जर्मनी भेजने के बहाने युवकों को एजेंटों ने बेलारूस पहुंचा दिया। जहां पुलिस ने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया। इसके बाद उन्हें बचने के लिए दो विकल्प बताए, रूसी सेना में भर्ती होकर यूक्रेन से युद्ध कर शहीद होना होगा या 10 साल तक जेल में रहने के बाद देश वापस लौटने की अनुमति मिलेगी।इनमें से परेशान कुछ युवकों ने सेना में जाने का रास्ता तो कुछ ने जेल का चुना। जिन युवाओं ने कोई भी विकल्प अपनाने से इनकार किया उन्हें जंगल में ले जाकर एजेंट के लोगों ने मार दिया। कुछ को जेल में डाल दिया। यह आपबीती बेलारूस से मौत के मुंह से बचकर घर लौटे दो ममेरे भाइयों मुकेश और सन्नी ने बताई।पीड़ित मुकेश ने बताया कि उनके साथ वहां पर अत्याचार किया गया। लोहे की रॉड, जलती हुई लकड़ी व सिगरेट दागी गई। उन्हें 15 दिनों में एक बार एक रोटी दी जाती थी। उन्हें पांच हजार रुपये में चार रोटियां दिखाकर एक रोटी देते थे। उन्हें नहीं पता था कि ढाई लाख रुपया प्रतिमाह की नौकरी के लालच में उन्हें इतनी बड़ी यातनाएं झेलनी पड़ेगी।पीड़ित ने बताया कि वह सिर्फ आठ दिन का सैनिक प्रशिक्षण देकर दूसरे देश से आए हुए युवाओं को लालच देकर सेना में भर्ती करते हैं। पीड़ितों ने बताया कि वह मंजर याद कर उनके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उसकी चर्चा करते हुए भी डर लगता है।

रुपये ऐंठने के लिए परिजनों को भेजते थे वीडियो
दूसरे पीड़ित युवक रेरकला निवासी सन्नी ने बताया कि हम दोनों भाई साथ में रहे। हमें यातना सहनी पड़ी। वह हमें घंटों बर्फ पर लेटाते थे और सिर पर बंदूक रखकर डराने की धमकी देकर वीडियो हमारे परिवार को भेजते थे ताकि परिवार के लोग उन्हें पैसा दे सकें। उसने बताया कि हमें जंगल में ले जाकर हमारे परिवार को वीडियो के माध्यम से धमकाते थे। हमारे साथ कई अन्य देशों के युवा व करनाल के युवा फंसे हुए थे। कई युवा तो मजबूरन सेना में भर्ती हो गए। जिनके परिवार वालों ने पैसे नहीं दिए उनके बच्चों को एजेंट के लोगों ने जंगल में मार दिया। इस बात का उन्हें तब पता चला जब दोबारा उन्हें जंगल में ले गए। जहां पर उन्होंने उन साथियों के शव देखे।

जेल में खाने को दिया मांस
मुकेश के पिता श्याम लाल ने बताया कि रात के समय अगर कोई भी फोन पर मैसेज आता तो हम तुरंत उठकर देखते कि हमारे बच्चों का मैसेज है। यह प्रक्रिया लगभग पांच माह तक चली। जब बेलारूस में उनके बच्चों को जेल में डाल दिया तो उन्हें मांस दिया गया लेकिन उनके बच्चों ने सिर्फ चाय पीकर गुजारा किया।

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